9 बच्चों का खूबसूरत जहाँ

रायगढ़, छतीसगढ़|

एक स्कूल में चाहे बच्चे कम हो या ज़्यादा, उन्हें दिल से पढ़ाना एक अध्यापक की ज़िम्मेदारी है। बाबूलाल पटेल जी ने ये बात हमेशा समझी है। इसीलिए अपनी प्राथमिक शाला में पढ़ने वाले केवल 9 बच्चों को पढ़ाने के लिए वे शिक्षा में नवोन्मेष की कोशिश करते रहते है। वह उच्चतर माध्यमिक से प्राथमिक कक्षाओं तक आने के बाद इन बच्चों की ज़रूरतों को समझते हैं। इसीलिए तो जब उनकी कक्षा का एक बच्चा, संकल्प, पढ़ने लिखने में थोड़ा असमर्थ होता दिखा, तो बाबूलाल जी ने उसका सावधानी से निरीक्षण किया। संकल्प को हर जगह से अपमान जनक बातें सुनने को मिलती थीं। कई अध्यापकों ने उसे ‘नालायक’ आदि बोल-बोल कर उसका आत्म-विश्वास नष्ट कर दिया था। बाबूलाल जी ने ये बात समझी, और संकल्प का सकारात्मक रूप से सुदृढ़ीकरण दिया। वे संकल्प को निरंतर कहते- “बेटा तुम बहुत होशियार हो”, “चलो साथ में पढ़ते हैं”, “तुम बिलकुल यह कार्य कर सकते हो!”

इतने प्रोत्साहन से संकल्प का आत्मविश्वास बढ़ा, और कक्षा में उसकी सह-भागिता में बढ़ोतरी हुई, साथ ही साथ उसके अंक भी बढ़े|

अगर शिक्षक बच्चों पर भरोसा करें तो बच्चों की अपनी क्षमताओं की समझ बदल सकती है और जो काम उन्हें उनके दोस्त, या माता-पिता या एनी लोग करने के लिए नाकाबिल समझते हैं, वे वही कार्य सफलतापूर्वक पूरा कर सकते हैं|

यह कहानी श्री बाबूलाल पटेल के जीवन पर आधारित है जो, रायगढ़, छत्तीसगढ़ से हैं|
कहानी लावन्या कपूर के द्वारा लिखी गयी है|  
हम छत्तीसगढ़ सरकार के आभारी हैं कि उन्होंने हमें  Humans of Indian Schools से परिचित किया|

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Ramesh Chand

very good

DEVANAND GAIROLA

सराहनीय कार्य किया है।

raghuvansh mishra

inspirative work.

बाबूलाल पटेल

धन्यवाद ! मिश्रा जी
वास्तव में हम बच्चों को बार बार “शाबास” “बहुत अच्छे ” ” वेलडन ” “आप तो होशियार हो आदि

बाबूलाल पटेल

आदि प्रोत्साहन से धनात्मक पुनर्बलन मिलता है

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