कबाड़ की कहानी, अंकों की जुबानी

बलोदा बाज़ार, छत्तीसगढ़|

“दो एकम दो , दो दुनी चार, दो तिए छ:…” यह है मनोज कुमार जी के विद्यार्थी जो हमेशा ही कुछ नया सीखने के लिए तत्पर रहते हैं| पहाड़े तो सब ही रटते – रटाते है किन्तु अपने विद्यार्थियों को पहाड़ों की अवधारणा स्पष्ट करने के लिए तथा पहाड़ो की भविष्य में ज़रूरत समझाने के लिए मनोज कुमार जी ने एक तरकीब निकाली| एक दिन रास्ते से गुज़रते हुए कबाड़ की एक दुकान से उन्होंने पुरानी-खराब साइकिल के पहियों की स्पोक्स, यानी पहिये के आरे लिए, और उनका ऐसा इस्तेमाल किया जो किसी ने सोचा न था|

जहाँ उनका काम साथ मिलकर पहिये के आकार को व्यवस्थित रखना होता है वहां ये आरे कभी अलग और कभी साथ होकर बच्चों को आकड़े व पहाड़े सिखाते हैंI बोर्ड पर कुछ कीलों के द्वारा इन आरों को टिकाने का स्टैंड बना दिया गया है| हर स्टैंड पर एक आरा रखकर बच्चों को गिनती सिखाई जाती है| इसी प्रकार पहाड़े भी सिखाए जाते हैं: दो आरों को एक स्टैंड पर रखा गया और दो और को दुसरे स्टैंड पर रखकर यह समझाया जाता है कि दो बार दो आरे रखे गए तो कुल संख्या हुई चार जिसे कहते है ‘दो दुनी चार’| इस तरीके को अपनाने से बच्चों के परीक्षाओं  में प्राप्त अंकों में बढ़ोतरी दिखी|बार-बार उस क्रिया को करते – देखते बच्चों के मन में उसका चित्र बन जाता है जो उन्हें जीवन भर याद रहता है|

यह कहानी श्री कुमार बंजारे के जीवन पर आधारित है जो, बलोदा बाज़ार, छत्तीसगढ़ से हैं|
कहानी ईशा राखरा के द्वारा लिखी गयी है|  
हम छत्तीसगढ़ सरकार के आभारी हैं कि उन्होंने हमें  Humans of Indian Schools से परिचित किया|

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Aruna diwan

nice

Arjun varma

good sir

saroj baghel

har shikchak aiysa soch kar kare to hmare bachcho ki dasha sudhar jayegi sir bhut achcha work hai aapka

Smt. Ishwari Bhoi

बहुत अच्छा कार्य।

raghuvansh mishra

good work

Ramdular Nirala

बहुत अच्छा कार्य

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6 Comments