अभाव से भाव तक

राजनंदगांव, छत्तीसगढ़|

“मैडम अंग्रेज़ी बहुत कठिन है, अंग्रेज़ी से डर लगता है|” पारुल चतुर्वेदी की कक्षा के छात्र अक्सर यह कहते| पर पारुल को इस डर में चुनौती नज़र आती| उनके नज़रिए से छात्रों का अंग्रेजी से कोई सम्बंध नहीं था और यही उनके डर का सबसे बड़ा कारण था| इसका समाधान खोजते हुए उन्होंने छठी कक्षा के विद्यार्थियों की पाठ्यपुस्तक की कविताओं को राज्य के लोकगीतों की धुन से मिलाने का प्रयास किया जो सफल हुआ|

वे इस सफलता को अपनी नईं योजनाओं की राह में पहला कदम मानती हैं| इसके बाद उन्होंने पाठ्यपुस्तक के एक अध्याय को नाटक का रूप देते हुए कक्षा के छात्रों से उस नाट्य की प्रस्तुति करवाई| इससे छात्रों को पाठ खेल में बेहतर समझ आने लगा और धीरे-धीरे उनके मन से अंग्रेजी का डर समाप्त होने लगा| उनकी एसी कई अवधारणाएं विद्यार्थियों के लिए सहायक सिद्ध हुई जिन्हें वह ‘आभाव से भाव तक’ का नाम देती है| उनकी योजनाए इतनी सफल हुई कि अब छठी कक्षा के छात्र सातवीं तथा आठवीं कक्षा की कविताएं भी खुश होकर पढ़ते हैं|


पारुल की यह सफलता देख अन्य शिक्षक प्रेरित हुए है| अब पारुल उच्च प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों का उन्मुखीकारण करती है और उन्हें विद्यार्थियों को ज्यादा संतोषजनक शिक्षण प्रदान करने के लिए अन्य गतिविधियों के सुझाव भी देती है| अपने उत्कृष्ट कार्य के लिए पारुल को मुख्यामंत्री शिक्षा गौरव अलंकरण ज्ञानदीप पुरूस्कार से सम्मानित किया गया है|

यह कहानी श्रीमती पारुल चतुर्वेदी के जीवन पर आधारित है जो, राजनंदगांव, छत्तीसगढ़ से हैं|
कहानी ईशा राखरा के द्वारा लिखी गयी है|  
हम छत्तीसगढ़ सरकार के आभारी हैं कि उन्होंने हमें  Humans of Indian Schools से परिचित किया|

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shree ram roy
Aatma ram choudhary

laudable actions, children learn better with acting

Sulochana choudhary

यह बहुत ही सराहनीय कार्य है बच्चे इस विधि से रुचि एवम सरलता से सीखेंगे।

Sulochana choudhary

यह बहुत ही सराहनीय कार्य है बच्चे इस विधि रुचि एवं सरला से सीखेंगे।

raghuvansh mishra

very practical work.

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5 Comments