कबाड़ से बना एक सुन्दर वातावरण

रायपुर, छतीसगढ़|

“विज्ञान की समझ केवल किताबों से या प्रयोग करने से नहीं आती| अगर अपने आस पास की दुनिया को गौर से देखें तो विज्ञान की कई अवधारणाओं के सिद्धांत आप समझ पाएंगे| मेरे लिये मेरी सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि मैं कैसे किसी विषय को बेहतरीन तरीक़े से बच्चों को समझा पाऊँ और कैसे उन्हें जीवन की अमूल्य शिक्षा अपनी ज़िन्दगी में लागू करने के लिए प्रोत्साहित कर पाऊँ|मेरे लिये यही एक चुनौती रहती थी। मैं पहले वातावरण का उदाहरण देते हुए विज्ञान को समझाने का थोड़ा प्रयास करता; दैनिक जीवन की घटनाओं का विश्लेषण करता|

उसके बाद भी अगर बच्चे नहीं समझ पाते तो किसी गतिविधि के मध्यम से समझाने का प्रयास करता। जैसे अगर मुझे बच्चों को अपवर्तन (Refraction) की संकल्पना को समझाना हो तो मैं रोज़मर्रा के जीवन से उदाहरण देता| जैसे- पानी से भरी बाल्टी मे हमें ऐसा प्रतीत होता है कि मग ऊपर है पर असल मे वह थोड़ा गहराई में होता है। सभी बच्चों ने अपने जीवन में यह देखा है, बस उसके पीछे छिपे विज्ञान की अवधारणा से वे अपरिचित हैं|

मेरा यह भी मानना है कि ऐसी सामग्री जो हमारे कोई काम नही आती, जिन्हे हम ज़्यादातर कबाड़ कह कर फ़ेक देते है, वे विज्ञान पढ़ाने में बहुमूल्य होती है|मैंने और मेरे स्कूल की प्रधान अध्यापक ने एक प्रयास किया है जिससे हम बच्चों को वातावरण के प्रति जागरूक बनाते हैं|

बच्चे अब अपने आप ही पौधों को पानी देते हैं, खाद बनाते हैं, कबाड़ की चीज़ो का इस्तेमाल करके पौधों की देखभाल करते हैं| हमने उन्हें गीले कचड़े और सूखे कचड़े के बीच अंतर समझाया| अगर आप उनसे पूछें तो वे आपको बताएँगे कि कैसे गीले कचड़े का प्रयोग करके हम पौधों को पोषण दे सकते हैं। मैं आपको हमारे विद्यालय आने के लिए आमंत्रित करता हूँ|”

यह कहानी श्री विक्रम त्यागी के जीवन पर आधारित है जो, रायगढ़, छत्तीसगढ़ से हैं|
कहानी तहरीन रेयाज़ के द्वारा लिखी गयी है|  
हम छत्तीसगढ़ सरकार के आभारी हैं कि उन्होंने हमें  Humans of Indian Schools से परिचित किया|

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Aaditya sharma

nice jugar

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