चलती-फिरती मात्राएँ

महासमुन्ड, छत्तीसगढ़|

“हाँ तो बच्चों, आज क्या पढ़ें हम?” वीरेंदर कुमार जी ने मुस्कराते हुए पूछा|

“सर हिंदी!” उल्लास से भरे आकाश ने कहा|

“चलो आकाश के कहने पे आज हम हिंदी ही पढ़ते हैं।” वीरेंदर जी बच्चों के बीच बैठे हुए बोले।

वीरेंदर जी ने अपने बस्ते से एक लोहे की तार निकाली। बच्चे जिज्ञासु होकर उन्हें देख रहे थे।

“देखो तो आज सर के पिटारे से क्या निकला!” रीमा बोली।

सारे बच्चे वीरेंदर जी से पूछने लगे कि इस तार से वो क्या करेंगे।

“अरे आकाश, ज़रा यहाँ आओ” वीरेंदर जी ने बुलाया।

आकाश झट से उठा और दो कदम दूर बैठे वीरेंदर सर के पास जाकर खड़ा हो गया।

वीरेंदर जी ने सबसे पूछा “बच्चों, आकाश का नाम कौन से वर्ण से शुरू होता है?”

“‘अ’ से” बच्चे हँसते हुए बोले।

वीरेंदर जी ने तार के टुकड़े से ‘ओ’ की मात्रा बनाई, और उसे आकाश के सर के ऊपर लगा दिया। फिर उन्होंने बच्चों से कहा – “शाबाश ! और अगर मैं उस अ के ऊपर ये बना दूँ, तो आकाश को कैसे बोलोगे ?”

“कैसे सर?” बच्चे पूछने लगे।

“ओकाश ! क्योंकि ये मात्रा ओ की है !” वीरेंदर जी बोले।
बच्चे अपने मुँह को ओ’ की आकृति में मोड़कर ‘ओ’ की ध्वनि का अभ्यास करने लगे।और इस तरह से वीरेंदर जी ने अपनी प्राथमिक शाला की कक्षा के बच्चों को मात्राएँ सिखाईं। उनके पास और भी कई दिलचस्प गतिविधियाँ हैं बच्चों के लिए। कभी आइए उनकी कक्षा में!

यह कहानी श्री वीरेंदर कुमार चौधरी के जीवन पर आधारित है जो, महासमुन्ड, छत्तीसगढ़ से हैं|
कहानी लावण्या कपूर के द्वारा लिखी गयी है|  
हम छत्तीसगढ़ सरकार के आभारी हैं कि उन्होंने हमें  Humans of Indian Schools से परिचित किया|

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raghuvansh mishra

simple way to learn.

SANJEEV KUMAR SURYAWANSHI

बहू ही शानदार चौधरी सर

sheela sahu

Very nice TLM sir meri class me prayog karugi

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3 Comments
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