बच्चों के पालक भी हैं स्कूल का हिस्सा

महासमुंद, छत्तीसगढ़|

बच्चों का रुझान और शिक्षकों का समर्थन सीखने के लिए बहुत ज़रूरी है। मगर हमे ये नहीं भूलना चाहिए की बच्चे का परिवेश और पालकों की सहभागिता भी सीखने में उतना ही महत्व रखती है।

जब मैंने पढ़ना शुरू किया तो मुझे पता लगा की विभागी तौर पर शिक्षकों को आदेश है की वे बच्चों के पालकों से साप्ताहिक रूप से मिलें और बच्चों के विकास के बारे में चर्चा करें। मगर जैसे समय बीता तो मैंने पाया की इस पहल के बावजूद भी पालक बच्चों की पढ़ाई में कोई रुचि  नहीं दिखा रहे हैं। वे अपने बच्चों को अन्य गतिविधियों में लिप्त रखते हैं।

तब मैंने सोचा की क्यों न पालकों की स्कूल में एक सक्रिय भूमिका रखी जाये और उन्हें स्कूली गतिविधियों का हिस्सा बनाया जाये। इसी सोच के साथ मैंने पालकों से रोज़ मिलना शुरु कर दिया। मैंने उनको स्कूल की गतिविधियों जैसे: पि.टी.एम्, वृक्षारोपण, अदि में शामिल होने को प्रेरित किया। मुझे लगता है की बच्चों को पढ़ाई के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए पहले पालकों का स्कूल पर भरोसा होना ज़रूरी है।

धीरे-धीरे मेरे संगी शिक्षकों ने भी मेरा साथ देना शुरू किया और पालकों से मेल-जोल बढ़ा दिया।अब ज़्यादातर बच्चों के माता-पिता व पालक स्कूल से जुड़े हुए हैं। अब तो वो इतने प्रभावित हैं की स्कूली घंटे ख़तम हो जाने के बाद भी वो स्कूल की निगरानी करते हैं।अब वे अपने बच्चों से रोज़ उनकी पढ़ाई व दिक्कतों के बारे में चर्चा करते हैं और हमारे साथ मिलकर उन दिक्कतों के सुझाव ढूंढते हैं। इससे न केवल स्कूल में पढाई का स्थर सुधरा है बल्कि बच्चों की हाज़री भी पहले से काफी बेहतर हुई है। हाल ही में मेरी पदवृद्धि होने के कारण मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा। मगर मुझे ख़ुशी है की स्कूल की परिस्थिति सुधरने में मैं कुछ योगदान दे पाया।

यह कहानी श्री यशवंत कुमार चौधरी के जीवन पर आधारित है जो, महासमुंद, छत्तीसगढ़ से हैं|
कहानी हर्षिता सैनी के द्वारा लिखी गयी है|  
हम छत्तीसगढ़ सरकार के आभारी हैं कि उन्होंने हमें  Humans of Indian Schools से परिचित किया|

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Anita sori

very good

Sandeep Kumar banjare

very good

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